वॉशिंगटन : अमेरिका और ईरान के बीच संभावित संघर्ष को लेकर दुनिया की नजरें इस समय मध्य-पूर्व पर टिकी हैं। इसी बीच भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल के. जे. एस. धिल्लन ने ईरान की सैन्य तैयारियों को लेकर अहम टिप्पणी की है। उनका कहना है कि ईरान ने किसी संभावित बड़े युद्ध की तैयारी अचानक नहीं की, बल्कि पिछले करीब चार दशकों से अपनी रणनीति इसी दिशा में तैयार की है।
वॉशिंगटन में ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन अमेरिका’ की ओर से आयोजित एक सत्र में बोलते हुए धिल्लन ने कहा कि ईरान ने ऐसी परिस्थितियों के लिए भी योजना बनाई है, जिसमें देश का शीर्ष नेतृत्व खत्म हो जाए। यही वजह है कि किसी भी दुश्मन के लिए ईरान की सैन्य क्षमता को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होगा। धिल्लन, जो भारत की रक्षा खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख भी रह चुके हैं, इन दिनों अपनी किताब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के प्रचार के सिलसिले में अमेरिका दौरे पर हैं।
युद्ध से पहले लक्ष्य और बाहर निकलने की रणनीति जरूरी
धिल्लन ने कहा कि किसी भी युद्ध में उतरने से पहले सिर्फ जीत की योजना बनाना पर्याप्त नहीं है। युद्ध का उद्देश्य क्या है और सही समय आने पर संघर्ष से बाहर कैसे निकलना है, इसकी रणनीति भी पहले से स्पष्ट होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि युद्ध के लक्ष्य की जानकारी सेना और सरकार के संबंधित लोगों को स्पष्ट रूप से होनी चाहिए। खासकर किसी दूसरे देश में सैन्य अभियान चलाने की स्थिति में वहां से सुरक्षित और रणनीतिक तरीके से बाहर निकलने की योजना बेहद महत्वपूर्ण होती है।
ईरान ने सेना को किया विकेंद्रीकृत
धिल्लन के मुताबिक, ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी लंबे समय से चली आ रही सैन्य योजना है। उन्होंने बताया कि ईरान ने अपनी सशस्त्र सेनाओं को करीब 31 अलग-अलग मुख्यालयों में विकेंद्रीकृत किया है। इसका मतलब यह है कि अगर केंद्रीय नेतृत्व या कमांड सिस्टम को बड़ा नुकसान भी पहुंचता है, तो स्थानीय सैन्य ढांचे के जरिए अभियान जारी रखा जा सकता है। यही विकेंद्रीकरण ईरान के लिए किसी बड़े हमले की स्थिति में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सुरक्षा कवच बन सकता है।
पहाड़ों से घिरा ईरान, जमीनी हमला बड़ी चुनौती
ईरान की भौगोलिक स्थिति भी उसके लिए एक अहम रक्षा कवच मानी जाती है। धिल्लन ने कहा कि इराक या सऊदी अरब के बड़े रेगिस्तानी इलाकों की तुलना में ईरान का पहाड़ी भूभाग किसी भी विदेशी सेना के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।
ईरान के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचने के लिए कई पर्वत श्रृंखलाओं को पार करना पड़ता है। ऐसे में बड़े पैमाने पर जमीनी सैन्य अभियान चलाना आसान नहीं होगा।
होर्मुज पर ईरान की खास तैयारी
समुद्री मोर्चे पर भी ईरान ने अपनी रणनीति अलग तरीके से तैयार की है। भले ही उसके पास अमेरिका को सीधे चुनौती देने वाली विमानवाहक युद्धपोत क्षमता या उतनी मजबूत वायुसेना नहीं है, लेकिन होर्मुज की खाड़ी और समुद्री मार्गों को लेकर उसने विशेष तैयारी की है। धिल्लन के अनुसार, ईरान तेज रफ्तार नौकाओं, समुद्री सुरंगों, टॉरपीडो नौकाओं, मिसाइलों और ड्रोन जैसे साधनों का इस्तेमाल कर समुद्री क्षेत्र में चुनौती खड़ी कर सकता है।
नुकसान के बावजूद ईरान की क्षमता बरकरार
अमेरिका और इजरायल के साथ संघर्ष में ईरान को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसके बावजूद धिल्लन का मानना है कि उसकी युद्ध क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। पिछले 40 वर्षों में तैयार की गई उसकी सैन्य संरचना और वैकल्पिक कमांड सिस्टम उसे बड़े हमले के बाद भी संघर्ष जारी रखने में मदद कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अपनी वायु रक्षा प्रणाली को मजबूत करने पर काफी जोर दिया है। ऐसे में किसी शक्तिशाली देश के साथ लंबे संघर्ष की स्थिति में ईरान को पूरी तरह पराजित करना आसान नहीं माना जा सकता।
कुल मिलाकर, धिल्लन की टिप्पणी यह संकेत देती है कि ईरान की सैन्य ताकत केवल हथियारों की संख्या पर निर्भर नहीं है। उसकी असली ताकत लंबे समय से तैयार की गई रणनीति, विकेंद्रीकृत सैन्य ढांचे, कठिन भौगोलिक स्थिति और असममित युद्ध की क्षमता में छिपी है। यही कारण है कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान के परिणाम सीधे और आसान नहीं होंगे।


