अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ती नजर आ रही है। अमेरिका में रूस पर प्रतिबंधों से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधेयक में भारत का नाम शामिल करने का प्रस्ताव सामने आया है। अगर यह संशोधन मंजूर होता है, तो रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले भारत समेत कुछ देशों के उत्पादों पर 100 फीसदी तक आयात शुल्क लगाने का रास्ता खुल सकता है।
अमेरिका में ‘लिंडसे ओ. ग्रैहम रूस और ईरान प्रतिबंध कानून’ को लेकर जल्द ही प्रतिनिधि सभा में मतदान होना है। यह विधेयक अमेरिकी सीनेट में पहले ही 86 के मुकाबले 11 वोटों से पारित हो चुका है। अब प्रस्तावित संशोधन के कारण भारत समेत कई देशों पर सबकी नजर है।
भारत समेत 10 देशों का नाम प्रस्तावित
डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रतिनिधि स्टेनी होयर की ओर से प्रस्तावित संशोधन में भारत और चीन के अलावा तुर्की, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक गणराज्य, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिज गणराज्य का नाम शामिल करने की मांग की गई है। संशोधन मंजूर होने की स्थिति में इन देशों से आने वाले उत्पादों पर 100 फीसदी तक आयात शुल्क लगाने का प्रावधान लागू हो सकता है। हालांकि, अंतिम स्थिति प्रतिनिधि सभा में होने वाले मतदान और आगे की विधायी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
आखिर रूस से तेल खरीदने पर इतना जोर क्यों?
इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बनाना बताया गया है। अमेरिका का आरोप है कि रूस कच्चे तेल की बिक्री से होने वाली कमाई का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध के लिए कर रहा है। इसी आर्थिक स्रोत को कमजोर करने के लिए रूस के तेल कारोबार और उससे जुड़े देशों पर दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। विधेयक में रूस द्वारा प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले जहाजों के तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कड़े प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या हो सकता है असर?
अगर भारत पर वास्तव में 100 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लागू होता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार पर पड़ सकता है। अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगा होने से निर्यातकों के सामने चुनौती बढ़ सकती है। खासकर अमेरिका को निर्यात करने वाले भारतीय कारोबारों पर लागत और प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी।
हालांकि, इस स्तर पर यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रस्तावित संशोधन का प्रतिनिधि सभा में क्या परिणाम आता है और कानून लागू होने के बाद उसका वास्तविक दायरा क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए फिलहाल इसे संभावित व्यापारिक दबाव के रूप में देखा जा रहा है, न कि लागू हो चुके 100 फीसदी टैरिफ के रूप में। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का फैसला भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है


