आरव आठ साल का एक प्यारा और जिज्ञासु बच्चा था। वह शहर के एक छोटे से स्कूल में पढ़ता था। उसे नई चीजें सीखना और अपने दोस्तों की मदद करना बहुत पसंद था। एक दिन स्कूल जाते समय आरव ने देखा कि सड़क के किनारे एक बुज़ुर्ग दादाजी भारी सामान उठाने की कोशिश कर रहे थे। उनके हाथ में कुछ किताबों का बैग था और वह बार-बार उसे उठाने की कोशिश कर रहे थे।
आरव कुछ देर के लिए रुक गया। उसे स्कूल के लिए देर हो रही थी, लेकिन उसने सोचा, “अगर मैं इनकी मदद कर दूंगा तो क्या होगा? मेरी थोड़ी-सी मदद से इन्हें आसानी होगी।” वह तुरंत दादाजी के पास गया और बोला, “दादाजी, मैं आपका बैग उठाने में मदद कर सकता हूँ।”दादाजी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने कहा, “बेटा, तुम्हारी उम्र छोटी है, लेकिन तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है।”
आरव ने उनका बैग पास की दुकान तक पहुँचा दिया। दादाजी ने उसे धन्यवाद दिया और प्यार से कहा, “हमेशा दूसरों की मदद करना, यही सबसे अच्छी आदत है।” जब आरव स्कूल पहुँचा तो थोड़ी देर हो चुकी थी। उसने अपनी शिक्षिका को पूरी बात बताई। शिक्षिका ने उसे डाँटने की जगह उसकी तारीफ की। उन्होंने पूरी कक्षा से कहा, “समय की पाबंदी जरूरी है, लेकिन किसी की मदद करना भी एक बड़ी सीख है।” उस दिन आरव को समझ आया कि छोटी-सी मदद भी किसी के चेहरे पर बड़ी खुशी ला सकती है। इसके बाद आरव ने हमेशा कोशिश की कि वह अपने आसपास के लोगों की मदद करे। धीरे-धीरे वह अपने स्कूल में अच्छे व्यवहार और मददगार स्वभाव के लिए जाना जाने लगा।
सीख:
दूसरों की मदद करने के लिए बड़ा होना जरूरी नहीं है। एक छोटा-सा अच्छा काम भी किसी की जिंदगी में खुशी ला सकता है।

