नई दिल्ली. मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच भारत और रूस के बीच एक अहम सैन्य समझौते रेलोस को लेकर अब नई जानकारी सामने आई है, जिसे मॉस्को ने सार्वजनिक किया है. यह समझौता पिछले साल हुआ था, लेकिन अब इसकी पूरी तस्वीर साफ हो रही है. इस समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे के क्षेत्र में अपनी सेना, युद्धपोत और सैन्य विमान तैनात कर सकते हैं. इसे दोनों देशों के रक्षा रिश्तों में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इस समझौते से पाकिस्तान के खिलाफ साजिश रचने वाला पाकिस्तान टेंशन लेने को मजबूर होगा.
यह समझौता आर्कटिक से लेकर हिंद महासागर तक असर डाल सकता है. इससे भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे सहयोग को और मजबूती मिलेगी. साथ ही यह दुनिया को, खासकर अमेरिका को, एक साफ संदेश भी देता है, जो हाल के समय में पाकिस्तान के करीब जाता दिख रहा है. समझौते के अनुसार, भारत और रूस एक-दूसरे के इलाके में अधिकतम 3,000 सैनिक, 5 युद्धपोत और 10 सैन्य विमान तक तैनात कर सकते हैं. इसका मतलब है कि दोनों देश जरूरत पड़ने पर अपने सैन्य संसाधनों को एक-दूसरे के ठिकानों से ऑपरेट कर सकेंगे. दिल्ली के सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज के पूर्व महानिदेशक एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त) के अनुसार जनवरी 2026 से लागू हुआ यह समझौता दिखाता है कि भारत और रूस दोनों अपने रिश्तों को और मजबूत करना चाहते हैं. यह समझौता भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को और मजबूत करता है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने में मदद करता है. रणनीतिक तौर पर यह समझौता दोनों देशों के लिए फायदेमंद है. इससे रूस को हिंद महासागर तक पहुंच मिलती है, जबकि भारत को आर्कटिक और प्रशांत क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का मौका मिलता है. अब यह सहयोग सिर्फ बंदरगाहों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दोनों देश लंबे समय तक एक-दूसरे के क्षेत्रों में अपनी सैन्य ताकत बनाए रख सकेंगे.
रूस के लिए समझौता क्यों जरूरी है?
रूस के लिए यह समझौता इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उसे गर्म पानी वाले बंदरगाहों की जरूरत रहती है. इस समझौते के जरिए रूस अपने सैनिकों और उपकरणों को भारत या अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में तैनात कर सकता है, जिससे उसे हिंद महासागर क्षेत्र में सीधी पहुंच मिल जाएगी. भारत को रूस के जरिए आर्कटिक और पश्चिमी प्रशांत तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी. इस समझौते से दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल भी बढ़ेगा. जब सैनिक लंबे समय तक साथ रहेंगे और अभ्यास करेंगे तो वे एक-दूसरे के अनुभव से सीख सकेंगे. खासकर साइबर युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, हाइपरसोनिक मिसाइल और नई सैन्य तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा.
आरईएलओएस समझौता क्या है?
आरईएलओएस समझौता सिर्फ सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है. यह ऊर्जा और खनिज व्यापार को भी आसान बनाएगा. इससे दोनों देशों के बीच सैन्य उपकरण और संसाधनों का आवागमन सरल होगा. भारत को इससे रूस के आर्कटिक शिपिंग रूट, यानी उत्तरी समुद्री मार्ग तक सीधी पहुंच मिलेगी, जो भविष्य के लिए बहुत अहम माना जा रहा है. भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उसके करीब 60 से 70 प्रतिशत सैन्य उपकरण रूसी मूल के हैं. इसमें पनडुब्बियां, सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमान और एस -400 मिसाइल सिस्टम शामिल हैं. ऐसे में यह समझौता इन उपकरणों के रखरखाव और संचालन को आसान बना देगा. आरईएलओएस समझौता भारत और रूस दोनों के लिए फायदेमंद है. यह भारत को रणनीतिक रूप से मजबूत बनाता है और रूस को नए क्षेत्रों में पहुंच देता है. साथ ही यह बदलते वैश्विक हालात में एक बड़ा भू-राजनीतिक संकेत भी देता है.


