नासिक में इतिहास रच गया! राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों सिंहस्थ कुंभ का ध्वजारोहण

गोदावरी तट पर गूंजे मंत्र, भव्य धार्मिक विधियों के बीच शुरू हुआ सिंहस्थ कुंभ; पहली बार राष्ट्रपति की उपस्थिति बनी ऐतिहासिक पल

नासिक : आस्था, परंपरा और इतिहास का अनूठा संगम शनिवार को नासिक में देखने को मिला। श्री क्षेत्र नासिक और त्र्यंबकेश्वर में सिंहस्थ कुंभ मेले की शुरुआत के साथ ही एक ऐतिहासिक ध्वजारोहण समारोह आयोजित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों कुंभ मेले का ध्वजारोहण संपन्न हुआ। नासिक के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब कुंभ मेले के ध्वजारोहण समारोह में देश की राष्ट्रपति शामिल हुईं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सुबह 11 बजकर 40 मिनट पर रामकुंड परिसर पहुंचीं। यहां सबसे पहले उन्होंने गोदा पूजन किया। इसके बाद गंगा गोदावरी मंदिर में दर्शन कर ध्वजस्तंभ का पूजन किया। धार्मिक परंपराओं और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विभिन्न विधियां संपन्न हुईं। इसके बाद ठीक दोपहर 12 बजकर 2 मिनट पर ध्वजारोहण किया गया। इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने लोगों के लिए यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नासिक की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान से जुड़ा यादगार पल रहा।

पहली बार राष्ट्रपति की उपस्थिति

नासिक में कुंभ मेले का अपना प्राचीन धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। हालांकि, अब तक कुंभ के ध्वजारोहण समारोह में राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति की उपस्थिति नहीं रही थी। इस बार राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मौजूदगी ने आयोजन को एक अलग ऐतिहासिक पहचान दी है।

गोदावरी तट पर तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान

ध्वजारोहण समारोह से पहले 30 अक्टूबर से गोदावरी नदी के तट पर तीन दिवसीय विशेष यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत हुई। ध्वजारोहण के बाद 1 नवंबर को श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य विधुशेखर भारती के हाथों यज्ञ की पूर्णाहुति संपन्न होगी।

भगवान श्रीराम के वनवास से भी जुड़ा है नासिक का इतिहास

नासिक की धार्मिक पहचान केवल कुंभ मेले तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र का संबंध भगवान श्रीराम के वनवास से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, जब प्रभु श्रीराम चित्रकूट से वनवास के दौरान नासिक आए थे, तब भी यहां सिंहस्थ कुंभ चल रहा था। इसी तरह माता सीता के हरण के बाद उनके प्रस्थान के समय भी सिंहस्थ का उल्लेख मिलता है।

नासिक में कुंभ मेले के आयोजन का इतिहास प्राचीन काल से मिलता है। उपलब्ध ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, ईस्वी सन 73 में सातवाहन राजा के शासनकाल में सिंहस्थ होने का उल्लेख पांडवलेणी में मिलता है। इसके अलावा देवगिरी के यादव वंश के दूसरे शासक के समय, ईस्वी सन 1000 के आसपास भी सिंहस्थ का उल्लेख मिलता है। संगमनेर ताम्रपट में गोदावरी, अरुणा और वरुणा नदियों के संगम पर सूर्यग्रहण के समय धार्मिक आयोजन होने का उल्लेख मिलता है।

इस बार 13 नहीं, 21 महीने तक चलेगा सिंहस्थ!

इस वर्ष का सिंहस्थ कुंभ ज्योतिषीय दृष्टि से भी खास माना जा रहा है। 31 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 2 मिनट पर गुरु ग्रह के सिंह राशि में प्रवेश के साथ सिंहस्थ की शुरुआत हुई। सामान्यतः गुरु ग्रह एक राशि में लगभग 13 महीने तक रहता है और इसी आधार पर सिंहस्थ की अवधि भी लगभग 13 महीने मानी जाती है। लेकिन इस बार सिंहस्थ करीब 21 महीने तक चलने वाला है।

इसके पीछे ज्योतिषीय गणना और ग्रहों की चाल को कारण बताया जा रहा है। गुरु ग्रह के वक्री होने यानी पीछे की ओर गति करने की स्थिति के चलते इस बार सिंहस्थ की अवधि सामान्य से अधिक रहने वाली है। हालांकि, इस दौरान दो बार अंतराल भी आएगा। नासिक और त्र्यंबकेश्वर की धरती पर शुरू हुआ यह सिंहस्थ कुंभ धार्मिक आस्था, सदियों पुरानी परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। गोदावरी के तट पर हुए इस भव्य ध्वजारोहण के साथ अब श्रद्धालुओं की नजरें आने वाले महीनों में होने वाले धार्मिक आयोजनों पर टिकी हैं।

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