देश के बड़े उद्योगपतियों की चर्चा होती है, तो अक्सर उनके कारोबार, संपत्ति और कंपनियों की सफलता सुर्खियों में रहती है। लेकिन इन बड़े कारोबारी समूहों की सामाजिक जिम्मेदारियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। ऐसा ही एक नाम है रिलायंस फाउंडेशन, जिसकी कमान नीता अंबानी संभालती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और महिला सशक्तीकरण जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली इस संस्था को आखिर पैसा कहां से मिलता है? इसका सालाना राजस्व कितना है और अब तक कितने लोगों तक मदद पहुंची है? आइए, आंकड़ों के जरिए समझते हैं।
2010 में हुई थी रिलायंस फाउंडेशन की शुरुआत
रिलायंस फाउंडेशन की स्थापना साल 2010 में हुई थी। नीता अंबानी इस संस्था की संस्थापक और अध्यक्ष हैं। इसका उद्देश्य समाज के अलग-अलग वर्गों तक विकास के अवसर पहुंचाना और जरूरतमंद लोगों की मदद करना है। फाउंडेशन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, ग्रामीण विकास, आपदा प्रबंधन, खेल, कला-संस्कृति और महिला सशक्तीकरण जैसे क्षेत्रों में काम करता है। इन पहलों के जरिए ग्रामीण समुदायों के विकास से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं और खेल के क्षेत्र में अवसर उपलब्ध कराने तक कई तरह के प्रयास किए जाते हैं।
खास बात यह है कि इन सामाजिक गतिविधियों में अंबानी परिवार की अगली पीढ़ी भी शामिल है। ईशा अंबानी, आकाश अंबानी और अनंत अंबानी भी फाउंडेशन के निदेशक मंडल के सदस्य हैं। इससे साफ है कि परिवार की भागीदारी केवल कारोबारी गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक कार्यों में भी दिखाई देती है।
आखिर कहां से आता है फाउंडेशन के पास पैसा?
रिलायंस फाउंडेशन के कामकाज को समझने के लिए उसके आर्थिक स्रोतों पर नजर डालना जरूरी है। रिलायंस इंडस्ट्रीज से मिलने वाला फंड संस्था के वित्तीय संसाधनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रिलायंस इंडस्ट्रीज की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी ने कुल 2,156 करोड़ रुपये खर्च किए थे। इसमें से 855 करोड़ रुपये रिलायंस फाउंडेशन को दिए गए थे। इसके अलावा अस्पतालों से जुड़े ट्रस्ट, खेल, शिक्षा और दूसरी सामाजिक संस्थाओं को भी फंड उपलब्ध कराया गया था।
यानी फाउंडेशन की सामाजिक गतिविधियों के पीछे कंपनी की ओर से मिलने वाला आर्थिक सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी तरह के संसाधनों से संस्था विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाती है।
कितना है रिलायंस फाउंडेशन का सालाना राजस्व?
रिलायंस फाउंडेशन के वित्तीय आंकड़े भी इसकी गतिविधियों के पैमाने को समझने में मदद करते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में फाउंडेशन का सालाना राजस्व लगभग 1,900.23 करोड़ रुपये रहा। यह राशि संस्था के कामकाज और विभिन्न सामाजिक पहलों के लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों की तस्वीर पेश करती है। हालांकि, राजस्व और खर्च अलग-अलग वित्तीय आंकड़े हैं। इसलिए दोनों को एक ही मानकर नहीं चलना चाहिए।
एक साल में ₹2,248 करोड़ का CSR खर्च
रिलायंस इंडस्ट्रीज की वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत कुल 2,248 करोड़ रुपये खर्च किए। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी का कुल CSR खर्च 2,156 करोड़ रुपये था। इस तरह दोनों वित्तीय वर्षों के आंकड़ों की तुलना करने पर सामाजिक जिम्मेदारियों पर किए जाने वाले खर्च में बढ़ोतरी दिखाई देती है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 2,248 करोड़ रुपये का आंकड़ा रिलायंस इंडस्ट्रीज के कुल CSR खर्च का है, न कि केवल रिलायंस फाउंडेशन को दिए गए पैसे का।
9.7 करोड़ लोगों तक पहुंचने का दावा
रिलायंस फाउंडेशन के कामकाज से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज की वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, फाउंडेशन के विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए अब तक देशभर में 9.7 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंचने का दावा किया गया है। इन पहलों में ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, खेल, पर्यावरण संरक्षण और आपदा के समय सहायता जैसे कार्य शामिल हैं।
इस आंकड़े के पीछे अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों तक पहुंचने की कोशिश दिखाई देती है। हालांकि, किसी भी सामाजिक पहल की वास्तविक सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने लोगों तक पहुंच बनाई गई, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि उनकी जिंदगी में कितना सकारात्मक बदलाव आया।
कारोबार के साथ सामाजिक जिम्मेदारी पर भी नजर
रिलायंस फाउंडेशन की गतिविधियां यह दिखाती हैं कि बड़े उद्योग समूहों की भूमिका केवल कारोबार और मुनाफे तक सीमित नहीं होती। शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में उनका योगदान समाज के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। नीता अंबानी के नेतृत्व में काम कर रहे इस फाउंडेशन के वित्तीय आंकड़े और सामाजिक पहुंच के दावे इसे देश की प्रमुख परोपकारी संस्थाओं में शामिल करते हैं। अब यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले वर्षों में इन पहलों का लाभ कितने लोगों तक पहुंचता है और समाज में किस तरह के बदलाव सामने आते हैं।


