भारत पर प्रतिबंध लगाने की अमेरिकी कोशिश को यूरोप का झटका!

ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर पानी फिरा, रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर 60 दिनों की राहत

रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा एक बार फिर चर्चा में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन भारत और चीन पर सख्त प्रतिबंध लगाने के लिए यूरोपीय देशों का समर्थन चाहता था, लेकिन यूरोप ने इस प्रस्ताव पर साथ देने से इनकार कर दिया। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के खुलासे के बाद यह मामला और गरमा गया है। अब ट्रंप प्रशासन ने संबंधित प्रतिबंधों पर 60 दिनों की अस्थायी राहत दी है।

यूरोप ने अमेरिका का साथ देने से किया इनकार

अमेरिका की समाचार एजेंसी एनबीसी के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों की भूमिका पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपने यूरोपीय सहयोगियों से रूस से तेल खरीदने वाले भारत और चीन पर प्रतिबंध लगाने की अपील की थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।

बेसेंट ने सवाल उठाया कि जब यूरोपीय देश इस मामले में अमेरिका का साथ देने को तैयार नहीं हैं, तो फिर अकेले अमेरिका ही इसका बोझ क्यों उठाए? उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप यूरोपीय देशों के साथ बातचीत जारी रखेंगे, लेकिन अमेरिका अकेले आगे बढ़कर आर्थिक नुकसान नहीं उठाना चाहता।

रूस से व्यापार को लेकर यूरोप पर भी निशाना

स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। उनके मुताबिक, यूरोप रूस से ऊर्जा और अन्य वस्तुओं का आयात जारी रखे हुए है। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों ने यूक्रेन की मदद के मुकाबले रूस और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अधिक पैसा दिया है। बेसेंट के अनुसार, अमेरिका हर साल रूस से लगभग 4 अरब डॉलर की वस्तुओं का आयात करता है, जिसमें 1.8 अरब डॉलर के उर्वरक शामिल हैं। वहीं, यूरोप का रूसी वस्तुओं का आयात इससे लगभग दस गुना अधिक है। इन आंकड़ों के जरिए उन्होंने सवाल उठाया कि रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बनाने की जिम्मेदारी केवल अमेरिका पर ही क्यों होनी चाहिए।

60 दिनों की राहत, लेकिन खतरा अभी टला नहीं

भारत के लिए इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि प्रतिबंधों को लेकर फिलहाल 60 दिनों की अस्थायी राहत दी गई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, इस अवधि का इस्तेमाल प्रतिबंधों और टैरिफ के अमेरिकी तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने के लिए किया जाएगा।

हालांकि, इस राहत को प्रतिबंधों की स्थायी समाप्ति नहीं माना जा सकता। यह समयसीमा आगे की रणनीति तय करने का अवसर है। ऐसे में भारत के लिए आने वाले दिन महत्वपूर्ण रहेंगे, क्योंकि रूस से तेल खरीदने का मुद्दा केवल ऊर्जा व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आर्थिक हितों पर भी पड़ सकता है।

रुबियो के भारत दौरे से भी बढ़ी नजरें

भारत और उज्बेकिस्तान के छह दिवसीय दौरे पर रवाना होने से पहले मार्को रुबियो ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप यह समझना चाहते हैं कि प्रतिबंधों और टैरिफ का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है। दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में तनाव के बीच कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों पर दुनिया की नजर बनी हुई है। ऐसे हालात में भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए तेल खरीदने के विकल्प और उनकी लागत बेहद अहम हैं।

ट्रंप के फैसले पर अमेरिका में भी सवाल

ट्रंप प्रशासन के इस फैसले को लेकर अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद अमी बेरा ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे पुतिन के लिए राहत और यूक्रेन के हितों के लिए नुकसानदायक बताया। सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भी प्रशासन की नरम नीति पर नाराजगी जताई।

फिलहाल, भारत पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच सहमति की कमी सामने आई है। अगले 60 दिनों में अमेरिका क्या रुख अपनाता है, यह देखना अहम होगा। क्योंकि इस फैसले का असर केवल भारत-रूस के तेल व्यापार पर ही नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक हितों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।

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