कभी घर में कोई नया सामान आने वाला होता था, तो खुशी इसलिए होती थी क्योंकि उसकी जरूरत थी। अब तस्वीर कुछ बदल गई है। मोबाइल पर कुछ पसंद आया, ऑर्डर किया और फिर शुरू हो जाता है इंतज़ार—“मेरा पैकेज कब आएगा?” कई बार सामान की जरूरत से ज्यादा उसके आने की खुशी हमें उत्साहित करती है।
सुबह उठते ही फोन पर नोटिफिकेशन देखना, “Out for Delivery” पढ़कर चेहरे पर मुस्कान आना और दरवाजे की घंटी बजते ही पैकेट लेने के लिए दौड़ना… यह अनुभव अब बहुत से लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि कई बार हमें खुद भी याद नहीं रहता कि हमने क्या ऑर्डर किया था। पैकेट हाथ में आते ही उसे खोलने की उत्सुकता अलग होती है। पैकिंग खोलते समय ऐसा लगता है जैसे कोई छोटा-सा सरप्राइज मिलने वाला हो। शायद यही वजह है कि आज ‘अनबॉक्सिंग’ सिर्फ सामान खोलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक छोटा-सा खुशी का पल बन गया है।
सोशल मीडिया ने भी इस आदत को और बढ़ाया है। किसी के कमरे में नया डेकोरेशन आइटम दिखा, किसी ने नया बैग दिखाया, किसी ने अपने पसंदीदा प्रोडक्ट का वीडियो बनाया—और कुछ ही मिनटों में हमारे मन में भी आता है, “ये तो मेरे पास भी होना चाहिए।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमें सच में उस चीज की जरूरत है, या सिर्फ उसे खरीदने का मन हो रहा है?
कई बार खरीदारी के बाद सामान कुछ दिनों तक खास लगता है और फिर घर के किसी कोने में पड़ा रह जाता है। अलमारी में कपड़े बढ़ते जाते हैं, कमरे में छोटी-बड़ी चीजें जमा होती जाती हैं और हमें पता भी नहीं चलता कि जरूरत कब धीरे-धीरे आदत में बदल गई।
फिर भी हर ऑनलाइन खरीदारी गलत नहीं है। जरूरत की चीज घर बैठे मिलना, कीमतों की तुलना करना और समय बचना—इन सबने हमारी जिंदगी आसान भी की है। फर्क सिर्फ इतना है कि हम खरीदारी कर रहे हैं या खरीदारी हमारी भावनाओं को चला रही है?
शायद अगली बार किसी चीज को कार्ट में डालने से पहले खुद से एक छोटा-सा सवाल पूछना चाहिए—
“मुझे इसकी सच में जरूरत है, या मुझे बस कुछ नया आने की खुशी चाहिए?”
क्योंकि आखिर में हर पैकेट खोलने की खुशी कुछ मिनटों की होती है, लेकिन समझदारी से की गई खरीदारी का सुकून लंबे समय तक रहता है।


