राहुल को अपनी गुल्लक बहुत प्यारी थी। वह हर बार मिलने वाले पैसे उसमें डाल देता था। कभी दादी ₹10 देतीं, तो कभी मम्मी ₹20। राहुल का सपना था कि गुल्लक भर जाने पर वह अपनी पसंद की लाल रंग की खिलौना कार खरीदेगा।
एक दिन घर में मम्मी काफी परेशान बैठी थीं। राहुल ने पूछा,
“मम्मी, क्या हुआ?”
मम्मी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा,
“कुछ नहीं बेटा, बस घर का थोड़ा खर्च बढ़ गया है।”
राहुल चुप हो गया।
उस रात वह अपनी गुल्लक के पास गया। उसने उसे हाथ में उठाया और कुछ देर तक अपनी पसंद की खिलौना कार के बारे में सोचता रहा।
फिर उसने गुल्लक खोली।
उसमें बहुत सारे सिक्के और कुछ नोट थे।
राहुल ने सारे पैसे निकालकर मम्मी के हाथ में रख दिए।
मम्मी हैरान होकर बोलीं,
“ये क्या कर रहे हो? तुम तो इससे अपनी कार खरीदने वाले थे!”
राहुल ने धीरे से कहा,
“कार तो बाद में भी खरीद लूंगा मम्मी… लेकिन अगर मेरे थोड़े से पैसे से आपकी परेशानी कम हो जाए, तो मुझे अभी कार नहीं चाहिए।”
मम्मी ने राहुल को गले लगा लिया।
कुछ दिनों बाद राहुल घर आया तो उसके कमरे में एक लाल रंग की खिलौना कार रखी थी।
उसने खुशी से पूछा,
“मम्मी! ये किसने दी?”
मम्मी मुस्कुराईं और बोलीं,
“तुम्हारी गुल्लक ने।”
राहुल समझ गया कि मम्मी ने उसके सारे पैसे वापस नहीं लिए थे। उन्होंने कुछ पैसे बचाकर उसके लिए कार खरीद ली थी।
राहुल ने कार को देखा और फिर मम्मी को गले लगा लिया।
उस दिन उसे समझ आया कि खुशी सिर्फ अपनी पसंद की चीज पाने में नहीं, बल्कि अपनों के चेहरे पर मुस्कान लाने में भी होती है।
सीख
प्यार और परिवार के लिए किया गया छोटा-सा त्याग भी बहुत बड़ी खुशी दे सकता है।


