गणपति बप्पा आए… अब हमारी जिम्मेदारी कहाँ है?

उत्सव बड़ा हो, खुशियां बड़ी हों… लेकिन क्या इसके लिए हमारा शहर गंदा और पर्यावरण प्रदूषित होना जरूरी है?

गणपति बप्पा के आगमन के साथ ही शहर का माहौल बदल जाता है। घरों में पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और गलियों में गणपति बप्पा मोरया की गूंज सुनाई देने लगती है। कहीं सुंदर सजावट की तैयारी है, तो कहीं गणपति मंडप को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी में उत्साह दिखाई देता है।

गणेशोत्सव सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं है। यह हमारी आस्था, हमारी परंपरा और हमारी भावनाओं से जुड़ा हुआ पर्व है। बप्पा के सामने खड़े होकर हम सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। लेकिन इसी आस्था के बीच एक सवाल हम सभी से पूछा जाना चाहिए—क्या बड़े उत्सव का मतलब बड़ी मात्रा में कचरा, तेज आवाज और पर्यावरण पर बढ़ता बोझ भी होना चाहिए?

बप्पा के स्वागत में प्रकृति पीछे क्यों छूटे?

आज गणेशोत्सव को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की कोशिशें भी दिखाई देती हैं। मिट्टी की मूर्तियां, प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल, प्लास्टिक से दूरी और पर्यावरण के अनुकूल सजावट जैसे प्रयास निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव की ओर इशारा करते हैं।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।

उत्सव खत्म होने के बाद सड़क किनारे पड़ा प्लास्टिक, फूल-मालाएं, सजावट का सामान और दूसरे तरह का कचरा देखकर मन में एक सवाल जरूर आता है—जिस बप्पा का हमने इतने प्यार से स्वागत किया, क्या उन्हें अपने शहर की ऐसी हालत देखकर खुशी होगी? हम बप्पा से अपने घर की खुशियों के लिए प्रार्थना करते हैं, तो अपने शहर की सफाई की जिम्मेदारी भी हमें ही निभानी होगी।

शोर कितना हो, यह भी सोचना होगा

गणेशोत्सव में ढोल-ताशे, संगीत और उत्साह की अपनी अलग जगह है। इनसे त्योहार की रौनक बढ़ती है। लेकिन जब यही शोर किसी बुजुर्ग, छोटे बच्चे, बीमार व्यक्ति या पढ़ाई कर रहे विद्यार्थी के लिए परेशानी बन जाए, तब हमें थोड़ा रुककर सोचना चाहिए। श्रद्धा में उत्साह होना जरूरी है, लेकिन दूसरों की परेशानी की कीमत पर उत्सव मनाना जरूरी नहीं है। हमारा त्योहार तभी सुंदर लगेगा, जब उसकी खुशी हमारे साथ-साथ आसपास रहने वाले लोगों तक भी पहुंचे।

श्रद्धा और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं

मेरी नजर में गणेशोत्सव की असली खूबसूरती सिर्फ बड़े मंडप, चमकदार रोशनी और ऊंची आवाज में नहीं है। असली खूबसूरती तब होगी, जब उत्सव खत्म होने के बाद भी हमारा शहर साफ दिखाई दे। अगर हम मिट्टी की मूर्ति चुनते हैं, सजावट में अनावश्यक प्लास्टिक से बचते हैं, कचरा इधर-उधर नहीं फेंकते और ध्वनि की मर्यादा का ध्यान रखते हैं, तो हमारी श्रद्धा और पर्यावरण दोनों का सम्मान होगा। इसके लिए किसी बड़े अभियान की जरूरत नहीं है। बदलाव की शुरुआत हम अपने घर से, अपने मंडप से और अपनी गली से कर सकते हैं। बप्पा से इस बार कुछ मांगने के साथ कुछ देने का संकल्प भी लें हर साल हम बप्पा से कुछ न कुछ मांगते हैं—अच्छी सेहत, सुखी परिवार, सफलता और शांति। लेकिन इस बार क्यों न बप्पा को कुछ देने का संकल्प लें?

उन्हें एक स्वच्छ शहर दें।
उन्हें साफ सड़कें दें।
उन्हें कम कचरे वाला उत्सव दें।
उन्हें ऐसा वातावरण दें, जहां इंसान और प्रकृति दोनों सुरक्षित रहें।

क्योंकि बप्पा की पूजा सिर्फ आरती और प्रसाद तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके प्रति सच्ची श्रद्धा हमारे व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।

मेरी बात

मेरा मानना है कि उत्सव को छोटा करने की जरूरत नहीं है, बस उसे जिम्मेदार बनाने की जरूरत है। श्रद्धा और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बल्कि सच्ची श्रद्धा में प्रकृति, समाज और अपने आसपास के लोगों के प्रति जिम्मेदारी भी शामिल होनी चाहिए। गणपति बप्पा हर साल आते हैं। हम उनका स्वागत करते हैं, उनकी पूजा करते हैं और फिर उन्हें विदा करते हैं। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनके द्वारा सिखाई गई अच्छी बातों को अपने जीवन में बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।

इसलिए इस गणेशोत्सव में जब हम पूरे उत्साह से कहें—

“गणपति बप्पा मोरया!”

तो दिल से एक संकल्प भी लें—

“बप्पा, आपका उत्सव पूरी श्रद्धा से मनाएंगे, लेकिन आपके जाने के बाद अपने शहर और प्रकृति को अकेला नहीं छोड़ेंगे।” क्योंकि बप्पा का स्वागत सिर्फ फूलों और रोशनी से नहीं, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता से भी होना चाहिए।

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