नैतिक दस साल का बहुत ही जिज्ञासु और चंचल बच्चा था। उसे क्रिकेट खेलना, चित्र बनाना और नई-नई चीजें सीखना बहुत पसंद था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका सबसे अच्छा दोस्त बन गया था—मोबाइल! सुबह उठते ही मोबाइल, खाना खाते समय मोबाइल और रात को सोने से पहले भी मोबाइल।
एक दिन उसकी मम्मी ने कहा,
“नैतिक, चलो आज शाम पार्क में चलते हैं।”
नैतिक ने मोबाइल से नजर हटाए बिना कहा,
“मम्मी, बस पाँच मिनट… मेरा गेम खत्म होने वाला है।”
लेकिन पाँच मिनट कब आधे घंटे में बदल गए, उसे पता ही नहीं चला।
अगले दिन स्कूल में टीचर ने बच्चों से पूछा,
“अगर तुम्हें एक दिन के लिए कोई सुपरपावर मिले, तो तुम क्या मांगोगे?”
किसी ने कहा—उड़ने की शक्ति।
किसी ने कहा—अदृश्य होने की शक्ति।
नैतिक ने तुरंत हाथ उठाया और बोला,
“मैं ऐसी सुपरपावर मांगूंगा जिससे मेरा मोबाइल कभी बंद न हो!”
पूरी क्लास हंसने लगी।
लेकिन तभी नैतिक की जेब में रखा मोबाइल अचानक बोल पड़ा!
“नैतिक… क्या तुम्हें सच में लगता है कि तुम्हें मेरी इतनी जरूरत है?”
नैतिक घबरा गया।
उसने इधर-उधर देखा और धीरे से पूछा,
“कौन बोल रहा है?”
मोबाइल बोला,
“मैं… तुम्हारा मोबाइल!”
नैतिक की आंखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं।
“तुम बोल कैसे सकते हो?”
मोबाइल हंसते हुए बोला,
“तुम मुझे इतना समय देते हो कि अब मुझे तुम्हारे बारे में तुमसे भी ज्यादा पता है।”
नैतिक चुप हो गया।
मोबाइल ने कहा,
“मुझे पता है कि तुम्हें क्रिकेट पसंद है, लेकिन तुम कई दिनों से मैदान में नहीं गए।”
“मुझे यह भी पता है कि तुम्हें चित्र बनाना पसंद है, लेकिन तुम्हारी ड्राइंग कॉपी कई दिनों से बंद पड़ी है।”
तभी मोबाइल की स्क्रीन पर नैतिक की एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।
वह अपने दोस्तों के साथ मैदान में क्रिकेट खेल रहा था और जोर-जोर से हंस रहा था।
नैतिक तस्वीर देखकर मुस्कुराया।
“मैं इतना खुश कब था?” उसने धीरे से पूछा।
मोबाइल बोला,
“जब तुम मुझे कम और अपनी असली दुनिया को ज्यादा समय देते थे।”
नैतिक कुछ देर सोचता रहा।
अगले दिन उसने अपने लिए एक छोटा-सा नियम बनाया—
“मोबाइल मेरे लिए है, मैं मोबाइल के लिए नहीं।”
अब वह मोबाइल का इस्तेमाल करता था, लेकिन उसकी पूरी दुनिया मोबाइल की स्क्रीन तक सीमित नहीं थी।
वह दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलता, किताबें पढ़ता, चित्र बनाता और परिवार के साथ समय बिताता।
कुछ दिनों बाद मम्मी ने मुस्कुराकर पूछा,
“नैतिक, अब तुम्हारा मोबाइल तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त है?”
नैतिक हंसकर बोला,
“मोबाइल मेरा दोस्त है, लेकिन मेरी असली दुनिया मेरे दोस्त, मेरा परिवार और मेरी खुशियां हैं।”
तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल हल्का-सा चमका।
स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“शाबाश नैतिक! अब तुम सच में स्मार्ट हो गए हो।”
नैतिक खिलखिलाकर हंस पड़ा।
उस दिन से उसने मोबाइल का इस्तेमाल करना तो सीखा…
लेकिन मोबाइल को अपनी जिंदगी का मालिक नहीं बनने दिया।
कहानी की सीख
टेक्नोलॉजी हमारी जिंदगी को आसान बनाने के लिए है, हमारी जिंदगी को अपने कब्जे में लेने के लिए नहीं।


