पितरों को समर्पित इन 15 दिनों में श्राद्ध, तर्पण और दान का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान कुछ चीजों की खरीदारी करने से बचना चाहिए। जानिए कौन-सी हैं वे 5 चीजें।
हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व माना जाता है। यह समय अपने पूर्वजों को याद करने, उनके लिए श्राद्ध और तर्पण करने तथा उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने का होता है। 2026 में पितृपक्ष 27 सितंबर से शुरू होगा। इन दिनों में घर-परिवार में पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों का माहौल रहता है। पितृपक्ष को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। इन्हीं मान्यताओं के अनुसार, इन 15 दिनों में कुछ चीजों की खरीदारी करने से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि, ये बातें धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं।
1. सोना-चांदी खरीदने से बचें
मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान सोना, चांदी या अन्य कीमती आभूषण खरीदने से बचना चाहिए। इस अवधि को भौतिक सुख-सुविधाओं के बजाय पितरों के स्मरण और धार्मिक कार्यों के लिए समर्पित माना जाता है।
2. नए कपड़ों की खरीदारी
पितृपक्ष में नए कपड़े खरीदने को लेकर भी कई परिवारों में परंपरा के अनुसार परहेज किया जाता है। इस दौरान नए कपड़ों और सजावट की चीजों के बजाय श्राद्ध कर्म, दान और जरूरतमंदों की सहायता पर ध्यान देने की मान्यता है।
3. घर का बड़ा सामान
कुछ धार्मिक मान्यताओं में पितृपक्ष के दौरान घर के लिए बड़े और महंगे सामान की खरीदारी को भी टालने की सलाह दी जाती है। जैसे फर्नीचर, महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामान या अन्य बड़ी खरीदारी को पितृपक्ष के बाद करना शुभ माना जाता है।
4. वाहन खरीदना
नई गाड़ी खरीदने को लेकर भी पितृपक्ष के दौरान कई लोग सावधानी बरतते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, नई शुरुआत और शुभ कार्यों के लिए पितृपक्ष के समाप्त होने का इंतजार करना बेहतर माना जाता है।
5. जमीन या संपत्ति की खरीदारी
जमीन, मकान या किसी बड़ी संपत्ति की खरीदारी को भी कुछ परिवार पितृपक्ष के दौरान टालते हैं। उनका मानना है कि इस अवधि के बाद शुभ मुहूर्त देखकर ऐसी खरीदारी करना उचित रहता है।
आखिर क्यों खास है पितृपक्ष?
पितृपक्ष को केवल खरीदारी से जोड़कर नहीं देखा जाता। यह अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना जाता है। इस दौरान लोग श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्य करते हैं। कहा जाता है कि पितरों का स्मरण केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और परिवार की परंपराओं को याद करने का भी एक अवसर है। इसलिए इन दिनों में दिखावे से ज्यादा श्रद्धा और सेवा को महत्व दिया जाता है।
ध्यान दें: ऊपर बताई गई बातें धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पितृपक्ष से जुड़ी परंपराएं अलग हो सकती हैं।


