नागपुर : सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने वाले गरीब और आम मरीजों के लिए दवाएं भरोसे का सबसे बड़ा सहारा होती हैं। लेकिन नागपुर के शासकीय अस्पतालों में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर सामने आया मामला इसी भरोसे पर सवाल खड़ा करता है। बुखार और शरीर दर्द के लिए दी जाने वाली पैरासिटामॉल 500 एमजी और हाई ब्लड प्रेशर की टेलमिसार्टन 40 एमजी दवाओं के सैंपल गुणवत्ता जांच में फेल पाए गए। हैरानी की बात यह है कि जांच रिपोर्ट आने तक मेयो अस्पताल में इन दोनों दवाओं की 42,911 गोलियां मरीजों को बांटी जा चुकी थीं।
यह आंकड़ा सिर्फ मेयो अस्पताल का है। मेडिकल अस्पताल प्रशासन ने अब तक वितरित की गई इन दवाओं की संख्या सार्वजनिक नहीं की है। ऐसे में सवाल है कि जांच में फेल हुई दवाओं की कितनी गोलियां नागपुर समेत राज्य के दूसरे सरकारी अस्पतालों तक पहुंचीं?
एफडीए ने अगस्त में लिए थे सैंपल
मध्य प्रदेश के उज्जैन रोड, धरमपुरी, इंदौर स्थित क्युरेजा हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी द्वारा बनाई गई इन दोनों दवाओं के सैंपल नागपुर एफडीए की टीम ने अगस्त में कामठी रोड स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अस्पताल से लिए थे। 10 सितंबर को जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद दोनों दवाओं में खामियां पाई गईं। ‘पीटीटीसी-108’ बैच की ‘पैरासेव 500’ पैरासिटामॉल की गोलियां निर्धारित मानकों के मुताबिक नहीं पाई गईं। वहीं ‘सीएचपीएलटी-416’ बैच की टेलमिसार्टन 40 एमजी की जांच भी फेल रही।
25 हजार पैरासिटामॉल में से 22,841 गोलियां मरीजों तक
महाराष्ट्र मेडिकल गुड्स प्रोक्योरमेंट अथॉरिटी (MMGPA) की ओर से ‘पैरासेव 500’ की ‘पीटीटीसी-108’ बैच की दवाएं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अस्पताल को भेजी गई थीं। वहां से मेयो प्रशासन ने 25 हजार गोलियां मंगवाई थीं। जांच रिपोर्ट आने तक इनमें से 22,841 गोलियां मरीजों को दी जा चुकी थीं। अब 2,159 गोलियां ही स्टॉक में बची हैं।
टेलमिसार्टन की 20,070 गोलियां बांटी गईं
इसी कंपनी की ‘सीएचपीएलटी-416’ बैच की टेलमिसार्टन 40 एमजी की 50 हजार गोलियां मेयो प्रशासन ने एक अधिकृत सप्लायर के माध्यम से खरीदी थीं। इनमें से 29,930 गोलियां स्टॉक में हैं, जबकि 20,070 गोलियां मरीजों को वितरित की जा चुकी हैं। दोनों दवाओं को मिलाकर 42,911 गोलियां मरीजों तक पहुंच चुकी हैं।
2023 में भी सामने आया था ऐसा मामला
साल 2023 में भी राज्य के सरकारी अस्पतालों में घटिया और नकली दवाओं के कई मामले सामने आए थे। मुंबई से लेकर नागपुर और यवतमाल तक सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे थे। ‘रेसीफ-500’, ‘रिक्लैव 625’ जैसी एंटीबायोटिक्स और ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट पाउडर की गुणवत्ता में भी खामियां सामने आई थीं।
अब एक बार फिर जांच रिपोर्ट आने से पहले हजारों गोलियां मरीजों तक पहुंचने से दवाओं की खरीद, गुणवत्ता जांच और वितरण व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। मरीजों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर किसी दवा का सैंपल फेल होता है, तो उसकी जानकारी और रोकथाम की प्रक्रिया रिपोर्ट आने तक क्यों नहीं पहुंचती?


