त्योहार खत्म होते ही सड़कों पर कचरा क्यों छोड़ जाते हैं हम?

कुछ घंटों की खुशी और कई दिनों की सफाई—क्या उत्सव का यही मतलब है?

त्योहार आते हैं तो शहर बदल जाता है। सड़कों पर रोशनी दिखाई देती है, बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, घरों और सार्वजनिक स्थानों पर सजावट होती है। लोग परिवार और दोस्तों के साथ त्योहार मनाते हैं, तस्वीरें लेते हैं और खुशियां बांटते हैं। लेकिन जैसे ही त्योहार खत्म होता है, उसी शहर की एक दूसरी तस्वीर सामने आती है—सड़कों पर बिखरा कचरा, जगह-जगह प्लास्टिक, खाने-पीने की चीजों के पैकेट और सजावट का सामान।

तब मन में एक सवाल जरूर उठता है—क्या हमारा उत्सव सिर्फ तब तक खूबसूरत है, जब तक हम उसे मना रहे हैं?

त्योहार के दौरान साफ-सफाई की जिम्मेदारी सिर्फ प्रशासन की नहीं होती। जिस सड़क पर हम जुलूस निकालते हैं, जिस मैदान में कार्यक्रम करते हैं और जिस सार्वजनिक जगह पर हम पूजा या आयोजन करते हैं, वह जगह सिर्फ हमारी नहीं, बल्कि पूरे शहर की होती है।

अक्सर हम घर का कचरा डस्टबिन में डालने को लेकर काफी सजग रहते हैं, लेकिन सार्वजनिक जगह पर वही जिम्मेदारी कहीं पीछे छूट जाती है। हाथ में मौजूद पानी की बोतल, खाने का पैकेट या सजावट का छोटा-सा टुकड़ा सड़क पर फेंकते समय शायद हमें लगता है कि इससे क्या फर्क पड़ेगा? लेकिन जब यही सोच हजारों लोगों की हो जाए, तो सड़क पर पड़ा एक छोटा-सा कचरा पूरे शहर की समस्या बन जाता है।

सवाल कचरे की मात्रा का ही नहीं, हमारी सोच का भी है।

त्योहार खत्म होने के बाद सफाईकर्मियों पर अचानक काम का बोझ बढ़ जाता है। जिन सड़कों पर कुछ घंटे पहले उत्सव की रौनक थी, वहीं अगले दिन सफाई की चुनौती खड़ी हो जाती है। हम त्योहार मनाकर घर लौट जाते हैं, लेकिन सफाई करने वाले कर्मचारी उसी जगह को दोबारा साफ करने में जुट जाते हैं।

क्या हमारी खुशी की कीमत किसी दूसरे के अतिरिक्त श्रम के रूप में चुकाई जानी चाहिए?

उत्सव मनाने का मतलब खुशी बांटना है, परेशानी बढ़ाना नहीं। अगर हम अपने आयोजन के बाद कचरा निर्धारित स्थान पर डालें, प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करें, गीले-सूखे कचरे को अलग रखें और सार्वजनिक स्थान को उसी स्थिति में छोड़ें, जैसी स्थिति में हमने उसे पाया था, तो बदलाव की शुरुआत यहीं से हो सकती है। जरूरत सिर्फ बड़े-बड़े स्वच्छता अभियानों की नहीं है। जरूरत उस छोटी-सी आदत की है, जिसमें हम सड़क पर कचरा फेंकने से पहले एक पल रुकें और सोचें—“अगर यह मेरे घर के सामने होता, तो क्या मैं इसे ऐसे ही छोड़ देता?”

शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी किसी एक विभाग या कुछ सफाईकर्मियों की नहीं है। शहर हमारा है, इसलिए उसकी साफ-सफाई में हमारी भूमिका भी होनी चाहिए। हर त्योहार हमें खुशियां देना चाहता है। लेकिन क्या यह और अच्छा नहीं होगा कि त्योहार खत्म होने के बाद भी उसकी खूबसूरती कुछ दिनों तक हमारे शहर की सड़कों पर दिखाई दे? अगली बार जब त्योहार खत्म हो और हाथ में कचरा हो, तो उसे सड़क पर छोड़ने से पहले सिर्फ एक सवाल खुद से पूछिए—

“हमने त्योहार मनाया है या शहर पर उसका बोझ छोड़ा है?”

क्योंकि असली उत्सव वही है, जिसके खत्म होने के बाद खुशी की याद रहे, कचरे का ढेर नहीं।

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