पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विकास को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि विकास का असली अर्थ तभी है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और लोगों के बीच असमानता को कम किया जा सके।
भागवत ने कहा कि देश की खुशहाली के लिए समाज के अंतिम व्यक्ति का सुखी होना जरूरी है। उन्होंने ‘अंत्योदय’ की इसी सोच को विकास का आधार बताया। उनके अनुसार, विकास के सबसे ऊंचे और सबसे निचले स्तर के बीच का अंतर जितना संभव हो, उतना कम होना चाहिए।
‘जो कर रहे हैं, उसका असर किस पर होगा?’
भागवत ने कहा कि जीवन में कोई भी फैसला लेते समय समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के बारे में सोचना चाहिए। खुद से यह सवाल करना चाहिए कि हमारे किसी काम का लोगों के जीवन पर सकारात्मक असर पड़ रहा है या नहीं। अगर असर सकारात्मक है, तो उस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि विकास केवल आर्थिक तरक्की तक सीमित नहीं होना चाहिए। भोजन, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं भी सभी तक पहुंचनी चाहिए। साथ ही हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने और दूसरों का सम्मान करने का अवसर मिलना चाहिए।
किसान आत्मनिर्भर हों, कर्ज से बचें
किसानों के मुद्दे पर बात करते हुए भागवत ने जैविक खेती, मिश्रित खेती और पशुपालन को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने बीज और खाद के मामले में आत्मनिर्भरता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि खेती करने वाला किसान लगातार कर्ज के बोझ में न फंसे, बल्कि अपनी जरूरतों को पूरा करते हुए अधिक आत्मनिर्भर बने। यही किसानों के कल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए। कुल मिलाकर, भागवत के संबोधन में विकास के साथ सामाजिक समानता, अंतिम व्यक्ति का कल्याण और किसान आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों पर जोर दिखाई दिया।


