अमेरिका में 2024 के चुनावी माहौल के दौरान डोनाल्ड ट्रंप पर हुए हमले की एक तस्वीर दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गई थी. खून से सना चेहरा, चारों तरफ अमेरिकी सीक्रेट सर्विस के एजेंट और समर्थकों की ओर उठी हुई मुट्ठी. यह तस्वीर कुछ ही पलों में ‘आइकॉनिक’ बन गई. लेकिन इस घटना के तुरंत बाद और अब ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान, इस हमले को लेकर साजिश की थ्योरी एक बार फिर जोर पकड़ती दिख रही है.
यह घटना बटलर, पेंसिल्वेनिया में हुई एक चुनावी रैली के दौरान सामने आई थी. गोलीबारी के बीच ट्रंप को एजेंट तुरंत मंच से हटाकर सुरक्षित स्थान पर ले जा रहे थे. इसी दौरान खींची गई तस्वीर में ट्रंप खून से सने चेहरे के साथ अपने समर्थकों की ओर मुट्ठी उठाते दिखे. घटना के कुछ ही घंटों में इंटरनेट पर कई बिना आधार वाले दावे फैलने लगे. कुछ लोगों ने कहा कि यह घटना ‘स्टेज्ड’ थी और ट्रंप के चुनाव अभियान को फायदा पहुंचाने के लिए रची गई थी. समय बीतने के साथ यह दावा खत्म नहीं हुआ, बल्कि ट्रंप समर्थक वर्ग के भीतर भी कुछ लोगों ने इसे फिर से उठाना शुरू कर दिया. कॉमेडियन टिम डिलन ने अपने पॉडकास्ट में कहा, ‘बस मान लो कि बटलर की घटना को स्टेज किया गया था, चुनाव में लोग ऐसा कर बैठते हैं.’ इसी तरह दक्षिणपंथी हस्तियां जैसे टककर कार्लसन और मार्जोरी टेलर ग्रीन के बयान भी इस तरह की थ्योरी को और हवा देते नजर आए.
ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी बड़े हमले को ‘स्टेज्ड’ कहा गया हो. 1995 में इजरायल के प्रधानमंत्री यित्झाक राबिन की हत्या को लेकर भी कुछ दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने इसी तरह के आरोप लगाए थे. वहीं 2022 में अर्जेंटीना की उपराष्ट्रपति क्रिस्टीना फर्नांडीज डी किर्चनर पर बंदूक तानने की घटना के बाद भी आरोप लगे कि इसे भ्रष्टाचार केस से ध्यान हटाने के लिए रचा गया.
जांच में क्या सामने आया?
बटलर की घटना हजारों लोगों, पत्रकारों और कैमरों के सामने हुई थी. विजुअल फॉरेंसिक जांच में सामने आया कि एक व्यक्ति पास की इमारत की छत पर चढ़ा और ट्रंप की ओर आठ गोलियां चलाईं. इनमें से एक गोली ट्रंप के दाहिने कान को छूते हुए निकली. इस हमले में एक व्यक्ति कोरी कॉम्पेरेटोर की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हुए. हमलावर को मौके पर ही सीक्रेट सर्विस ने मार गिराया. बाद में FBI ने उसकी पहचान 20 वर्षीय थॉमस क्रूक्स के रूप में की.
इस घटना को लेकर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों ने बिना सबूत कई आरोप लगाए. कुछ ने जो बाइडेन, कुछ ने FBI, कुछ ने इजरायल और यहां तक कि खुद ट्रंप पर भी इस हमले को रचने का आरोप लगाया. हालांकि इन दावों के समर्थन में कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया.
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के मीडिया प्रोडक्शन विशेषज्ञ स्पेंसर पार्सन्स ने एक काल्पनिक विश्लेषण किया. उन्होंने बताया कि फिल्मों में शूटिंग सीन तैयार करने के लिए डायरेक्टर, कैमरा टीम, लाइटिंग, साउंड, स्पेशल इफेक्ट्स और सेफ्टी टीम जैसी बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत होती है, लेकिन अगर इतनी बड़ी घटना को ‘स्टेज’ करना हो, तो कम से कम लोगों को शामिल रखना होगा ताकि राज खुल न सके जो अपने आप में बेहद मुश्किल है.
फिल्मों में कई टेक लिए जाते हैं, कैमरा एंगल बदले जाते हैं और बाद में एडिटिंग होती है. लेकिन बटलर जैसी लाइव रैली में ऐसा संभव नहीं होता. यहां सिर्फ एक मौका होता है, और चारों तरफ मौजूद पत्रकारों और आम लोगों के मोबाइल कैमरे किसी भी डिजिटल छेड़छाड़ की गुंजाइश खत्म कर देते हैं.
अगर इसे स्टेज करना होता, तो हमलावर को ऐसी जगह रखना पड़ता जहां लोग उसे देख सकें और वह फायर भी कर सके, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां उसे पहले ही न मार दें. पार्सन्स के मुताबिक, ‘इसके लिए परफेक्ट टाइमिंग चाहिए, जो लगभग नामुमकिन है.’ साथ ही हमलावर को इतना सटीक निशाना लगाना होगा कि वह ट्रंप के बेहद करीब गोली चलाए, लेकिन उन्हें घायल न करे जो बेहद कठिन काम है. ऐसी किसी साजिश में यह भी मानना पड़ेगा कि सीक्रेट सर्विस हमलावर को मार देगी. यानी जो व्यक्ति इस रोल में होगा, उसे अपनी जान गंवाने का जोखिम उठाना होगा. साथ ही, कोरी कॉम्पेरेटोर की मौत इस ‘स्टेजिंग’ थ्योरी को और जटिल बना देती है या तो इसे स्क्रिप्ट में शामिल करना पड़ेगा या फिर मानना पड़ेगा कि चीजें पूरी तरह नियंत्रण से बाहर चली गईं.
फिल्मों में खून दिखाने के लिए ‘स्क्विब’ जैसे छोटे विस्फोटक उपकरण इस्तेमाल होते हैं. कुछ लोगों ने दावा किया कि ट्रंप ने भी ऐसा ही किया. हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार वीडियो में खून कब पहली बार दिखा, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. दूसरा तरीका यह हो सकता था कि ट्रंप खुद को ब्लेड से हल्का जख्म दें, जैसा रेसलिंग में होता है. लेकिन ऐसा करने पर ब्लेड को छिपाना और बिना अतिरिक्त चोट के बचना बेहद मुश्किल होता.
फेडरल जांच और मीडिया रिपोर्ट्स में सुरक्षा चूक और जवाबदेही की कमी जरूर सामने आई. लेकिन हमलावर के फोन, कंप्यूटर और उसके करीबियों से पूछताछ के बाद भी उसका साफ मकसद या राजनीतिक विचारधारा सामने नहीं आ सकी.


